अब किसी से शिकायत करे भी तो क्या हम
जिन्दगी या वqत जाने कौन ज्यादा बेरहम
वqत के आईने में जिन्दगी धुंधली लगती है
जिन्दगी की तस्वीर मे वqत के साये सिमटे हैं
कौन किसको बदल देता है कौन जाने
कुछ भी हो हम तो मरते है मरते हैं
दोनो की मार से कब कहां बचते हैं हम
जिन्दगी या वqत जाने कौन ज्यादा बेरहम
कुछ पल हंसी के वqत ने दिये तो
जिन्दगी की उलझनों ने उन्हें छीन लिया
जब जिन्दगी थोडी मेहरबान हुई
वqत ने झोली भरके दर्द दिया
ये देखके आंखें हमेशा है रहीं नम
जिन्दगी या वqत जाने कौन ज्यादा बेरहम
एक खिलौने की तरह ये खेलती रही हमसे
एक कथपुतली सी हमें ये नचाती ही रही
जब चाहा मुस्कुराहटे दी हमे
जब चाहा ये रुलाती ही रही
जिन्दगी और वqत के थपेडों मे ही रहे हम
जिन्दगी या वqत जाने कौन ज्यादा बेरहम
Thursday, August 6, 2009
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